यह उपन्यास नायक राहुल के लालबत्ती और प्रेमिका शालू को पाने के दो सपनों के इर्द-गिर्द बुना गया है. राहुल लालबत्ती पाने की ख़्वाहिश में कटिहार से दिल्ली के मुखर्जीनगर पहुंचता है. वही मुखर्जीनगर, जो दिल्ली में बिहारी छात्रों की राजधानी है. राहुल पर दबाव है कि जल्द से जल्द आईएएस बने, ताकि प्रेमिका के संपन्न और रसूखदार परिवार से उसका हाथ मांग सके.
वहीं बिहार में शालू के घरवाले उसकी शादी के लिए लड़के देख रहे हैं. राहुल को लगता है कि उसके दो सपनों में से एक अधूरा रह जाएगा. दोनों सपनों यानी दिल और दिमाग़ की कशमकश में दिन बिता रहा राहुल हर उस बिहारी का प्रतिनिधित्व करता है, जो पैदा ही लालबत्ती पाने के लिए होता है. होश संभालते ही जिसे मां-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए बिहार से बाहर भेज दिया जाता है.
लेखक ने बिहारी सपनों और प्रेम के बैकड्रॉप पर रची इस कहानी में स्टूडेंट लाइफ़ के मस्तमौला दिनों और दोस्ती की ताक़त भी बयां करने की कोशिश की है.
मुख्य पात्र राहुल और उसके रूम पार्टनर संजय की दोस्ती, अलग-अलग धर्मों को माननेवाले अब्दुल और गोपी की यारी की उपन्यास की कहानी को आगे बढ़ाने में अहम् भूमिका है. आगे चलकर राहुल की कहानी उस दोराहे पर पहुंचती है, जहां उसे अपने दोनों सपनों में से किसी एक का चुनाव करना है. और फिर एक फ़िल्मी ट्विस्ट के साथ कहानी का सुखद समापन हो जाता है.
यह एक ओवर हाइप्ड किताब है इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आपको ज़्यादा पन्ने नहीं पलटने पड़ेंगे. फ़िल्मी कहानी को बिहारी तड़का देकर परोसने की लेखक शशिकांत मिश्र की कोशिश पाठकों का ज़ायका ख़राब कर देती है. संभावनावाले प्लॉट को कमज़ोर लेखकीय ट्रीटमेंट ने झिलाऊ बना दिया है. इसके संवाद बेहद उबाऊ हैं. हल्के-फुल्के पलों के लिए जो संवाद या ट्विस्ट डाले गए हैं, कुछेक जगहों को छोड़कर गुदगुदा नहीं पाते. कहानी पर न दिल्ली की छाप दिखती है और न ही इसका बिहारी फ़्लेवर असरदार बन सका है.
लेखक: शशिकांत मिश्र
मूल्य: रु. 99 (पेपर बैक)
फ़ंडा, राधाकृष्ण प्रकाशन का उपक्रम
7-31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002