Monday, August 27, 2018

पुस्तक समीक्षा : डार्क हॉर्स



सिविल सेवाओं की तैयारी में लगे परीक्षार्थियों की ज़िंदगी और संघर्ष की दास्तां है लेखक नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास डार्क हॉर्स. इसकी टैग लाइन है एक अनकही दास्तां. पर लूज़र कहीं का, दिल्ली दरबार, नॉन रेज़िडेंट बिहारी जैसी किताबें पढ़ चुके पाठकों को यह दास्तां अनकही नहीं लगेगी.

कहानी के तौर पर आपको कुछ भी नया नहीं मिलनेवाला. हां, ट्रीटमेंट में फ़र्क़ ज़रूर है. ऊपर बताई गई किताबों की तुलना में डार्क हॉर्स की भाषा और कहानी कहने के ढंग में परिपक्वता है. यदि यह अपने तरह की पहली किताब होती तो ज़रूर बेहतरीन कही जाती. हालांकि कहानी लीनियर है यानी आपको यह पता चल जाता है कि आगे क्या होनेवाला है.

पर कहानी में बहाव है, हल्के-फुल्के लम्हे हैं, गंभीर पल भी हैं, यही कारण है कि इसको पढ़ना शुरू करने के बाद आप इसे बंद करके बगल में नहीं रख सकते.

डार्क हॉर्स की सबसे अच्छी बात यह है कि लेखक ने इसमें तैयारी कर रहे इन विद्यार्थियों के घर-परिवार का भी चित्रण किया है. उपन्यास के सबसे सजीव और अनूठे लम्हे वहीं मिलते हैं. हालांकि ऐसा लगता है कि सबकुछ जल्दबाज़ी में समेटने की कोशिश की गई है, पर चित्रण है मज़ेदार. लेखक ने यदि मुखर्जी नगर और आसपास के इलाक़ों की कहानी, जो कि कई दफ़े पढ़ी जा चुकी है, के बजाय थोड़ा रुककर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों की कहानी को ज़रा और विस्तार दिया होता तो साहित्य की दृष्टि से एक अच्छी कृति बनती.

जितना उन्होंने लिखा है, उससे एक बात स्पष्ट है कि इनके पास कहने के लिए बहुत कुछ था. मसलन एग्ज़ाम क्लियर करने के बाद आनेवाले शादी के ऑफ़र और लड़कों के अपने प्रेम संबंध के चलते पैदा होनेवाली दुविधा की स्थिति, जैसे परीक्षा पास करनेवाले विमलेंदू के साथ होता है. 

संतोष, रायसाहब, मनोहर, गुरु, जावेद, विमलेंदू की यह कहानी एन्टरटेन्मेंट में कोई कसर नहीं छोड़ती. यदि आप दिल्ली होते हुए यूपी और बिहार के गांवों के मनोरंजक सफ़र पर चलना चाहते हैं तो इस डार्क हॉर्स पर अपना दांव लगा सकते हैं.

डार्क हॉर्स
लेखक: नीलोत्पल मृणाल
मूल्य: रु. 175 (पेपर बैक);
प्रकाशन: हिंद युग्म-वेस्टलैंड, 201 बी, पॉकेट ए, मयूर विहार फ़ेज़-2, दिल्ली-110091

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